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उजड़े चमन मे कौओं की बीट

जिन्दगी हर पल आसान होती तो शायद किसी और नाम से जानी जाती. और जिन्दगी भी किस की—हम जैसे लोगों की, जो मुसीबत के नियमित ग्राहक ठहरे. मुसीबत दुनिया के किसी कोने से शुरू हो, बिना हम से मिले उसे चैन ही न मिलता. कही न कही से ढूंढ ही लेती है. क्या सुनाए आपको अपना दुखड़ा? कहाँ से शुरू करुँ? शब्द नहीं है हालात बयाँ करने के लिये. वैसे भी अब यादों के मवाद निकालने के अलावा और क्या काम रह जाता है. दो हफ़्ते घर से बाहर क्या गया मेरे बसे-बसाए खिलते हुए चमन को किसी की नजर लग गई. लौट कर उस मनहूस सुबह रोज के नियम की तरह बालकनी में जा कर जब अँगड़ाई ली तो लगा जैसे पैरो तले जमीन खिसक गई हो. चश्मा पहन कर और दूरबीन से आँखें फाड़-फाड़कर देखने पर भी हालात में न कुछ सुधार होना था और न ही हुआ. मेरा दिल धक्क रह गया. आँखों के आगे अन्धेरा छा गया, गला सूख गया और मैं सर पकड़ कर बैठ गया. जो नहीं होना चाहिए था वह हो चुका था. सब कुछ लुट चुका था. वह मंजर मेरे लिये किसी त्रासदी से काम न था. घर के सामने शादी की विदाई बाद वाला मायूस दृश्य साकार था. मुहल्ले की कटी हुई नाक टुकड़ों में बिखरी पड़ी थी. जिसके स्...

अमर होने की कवायद

अमर होने का फार्मूला तैयार है और मार्केट मे सहज उपलब्ध है. क्या आप इस्तेमाल करना चाहेगे? जरा एक नजर ड़ाले इसके गुणो पर और जानिये कि कैसे ये फार्मूला ब्लोग जगत को हिलाने की तैयारी कर रहा है. क्या आप सौरभ जी को जानते है? नही जी, मै क्रिकेटर सौरभ गांगुली की बात नही कर रहा हूं. आप कहेगें फिर कौन सा सौरभ? दुनिया मे सौरभ जाने कितने ही होगें, एक तो मै खुद ही हूं. अब किस के बारे मे बात करें? परेशान मत होईये. मै आज आपको अपने खुद के बारे मे बता कर झिलाने के मूड़ मे कतई नही हूं. चलिये छोड़िये सौरभ जी को, यह बताईये कि आप मनोज कुमार जी के बारे मे तो जानते ही होगे? नही? सोमनाथ जी, जोगिंदर जी, निर्मलजीत सिंह जी, गुरुबचन जी..अब कुछ याद आया? चलिये एक आखिरी कोशिश करते है. शैतानजी और अब्दुल जी के बारे मे आप क्या जानते है? कुछ याद नही आ रहा. परेशान न होए, कोई बात नही. शिल्पा शेट्टी तो याद है न? बस यही काफी है. सच मे अब किस-किस को याद रखे. दुनिया है, चलती रहती है. लोग आते है, चले जाते है. अब इस मे परेशान होने की क्या बात है. जब दुनिया नश्वर है, उससे पैदा हुए हो, तो कैसे आशा रख सकते हो कि तुम अमर रहोगे? ...

जरूरत है कुछ समर्पित चेले-चपाटो की

अपनी पिछली पंचवर्षीय योजना के तहत जब मैने घर की संसद मे अपने ब्लोग को शुरू करने की अर्जी दी थी तो मुझे जरा सा भी अंदेशा नही था कि मेरा यह क्रांतिकारी कदम मुझे किसी दोराहे पर पहुँचा देगा। क़ैसे भूल जाऊँ उस महान क्षण को जिसने मेरी जिन्दगी और मेरे घर के इतिहास को एक नया मोड़ प्रदान किया था। कितनी दिक्कतो से गुजरने के बाद मेरे हिन्दी के ब्लोग ने जिन्दगी की किरण देखी थी। एक थका देने वाली लम्बी अनुमोदन प्रक्रिया—जिसमे घर के हर सदस्य से “अन-आपत्ति” प्रमाणपत्र लेकर उसको घर की संसद मे बहुमत (यानी की बहुओ के मत)से पारित करना शामिल था—से गुजरने के बाद एक लंबी नियमावली मेरे हाथ मे थमा दी गई थी। मैं क्या लिख सकता हूं, कितना लिख सकता हूं, कब लिख सकता हूं और किसके बारे मे लिख सकता हूं—यह सब मुझे “छोटा बच्चा जान कर” उस नियमावली मे विस्तार से समझाया गया था। पत्नीजी ने भी इस मौके का राजनीतिक लाभ लेने मे कोई कंजूसी नही दिखाई। सरकारी ‘सर्वशिक्षा अभियान’ की तर्ज़ पर मुझे पढ़ाने और लिखाने का दौर जो शुरू हुआ वो मेरी दो-तीन महीनो की तनख्वाह की अंतेष्ठी कर के ही खत्म हुआ। नतीजन, मै लिखने तो लगा पर मेरा लिखा ...

अभिनव का स्वर्ण, हमारे गले का फन्दा

आज जब दफ्तर से मैने घर का रुख किया तो उम्मीद न थी कि मुसीबतो का एक बड़ा ठीकरा मेरे सर पर फोड़ने के लिये हमारी पूज्यनीय पत्नीजी पूरी तरह से तैयार वैठी होगी। वैसे मेरा पति होने का अनुभव इतना कम है कि मेरे लिये अपनी पत्नीजी की तरफ से हुए किसी भी आक्रमण का अन्दाज लगाना मुश्किल ही नही, नामुमकिन है। सरकारी आँकड़ो की तरह मेरे अन्दाजें भी अक्सर जमीनी हक़ीकतो से कोसो दूर ही रहते थे। नतीजन, कई बार पत्नी जी के ऐसे हमलों के दौरान मै शहीद होते-होते बचा हूँ। पर जो कभी नही हुआ, वो शायद आज होने जा रहा था। घर की घंटी बजाने से पहले ही पत्नी जी ने दरवाजा खोलकर मुसकुराते हुए अपने साक्षात दर्शन दिए। मेरे दिमाग मे खतरे की सारी घंटीयाँ एक साथ पूरे दम से बज उठी। न तो आज तनख्व्या मिलने का दिन था और न ही किसी की शादी का बुलौउआ आया था। वित्तमंत्री जी ने भी शादी-शुदा लोगों की लिये कर मे किसी प्रकार की कटौती की घोषणा नही की थी। फिर ऐसा क्या संकट आन पड़ा कि पत्नीजी को मुझे अपने साक्षात दर्शन देने की आवश्यकता महसूस हुई? यह ड़र मै अनुभव के आधार पर महसूस कर रहा था। मेरी पूज्यनीय पत्नीजी ने जब मुझे पहली बार हंस कर द...

नियंत्रण-रेखा

टीवी बन्द करके मैने अपने बगल मे लेटी हुई एकलौती पत्नी जी पर नजर डाली। बिस्तर की वास्तविक नियंत्रण रेखा का रोज की तरह उलंघन हो चुका था और मेरे पास सिवाए विरोध दर्ज कराने की पारम्पारिक परम्परा का निर्वाह करने के अलावा और कोई चारा नही था। विरोध दर्ज कराने से समस्या का हल तो नही निकलता पर इसी बहाने से कम से कम घर मे कुछ बोलने का मौका जरूर मिल जाता है। सुरसा की तरह मुँह फाडे, देश की सरकार की तरह कान मे तेल डाले, और शेयर बाजार की तरह् औंधी लेटी हुई अपनी पत्नी जी से अपने इलाके से हट जाने का नम्र निवेदन करने की भी मेरी हिम्मत नही हुई। कही पत्नी जी ब्लूलाईन बसो की तरह बेकाबू हो गई तो कौन करेगा मेरी रक्षा उस प्रलय की घडी मे। जनतंत्र मे मौलिक अधिकार अक्सर रद्दी के भाव बिकते है और वैसे भी मेरे सभी मौलिक अधिकार तो शादी के तुरंत बाद तत्काल प्रभाव से निष्क्रिय कर दिए गये थे। यकीन मानिए, मै आज भी अपने शादी के घिसे-पिटी विडियो को देख कर यह जानने की कोशिश करता हूं कि क्यों, कैसे और कब पंडितजी ने मेरे मौलिक अधिकारो को अग्निदेव को समर्पित किया था। उस दुख की घडी मे न तो मुझे पूरे देश को हिला देने मानव अधिक...