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इसलिए विदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के कुछ अख़बार

किस तरह हमारे कुछ अख़बार धीरे-धीरे हमसे हमारी बोलियाँ और भाषा छीन रहे हैं। प्रभु जोशी का एक विचारात्मक आलेख जो हम सभी को कुछ सोचने पर मजबूर करता है। सृजनगाथा के सौजन्य से

अमर होने की कवायद

अमर होने का फार्मूला तैयार है और मार्केट मे सहज उपलब्ध है. क्या आप इस्तेमाल करना चाहेगे? जरा एक नजर ड़ाले इसके गुणो पर और जानिये कि कैसे ये फार्मूला ब्लोग जगत को हिलाने की तैयारी कर रहा है. क्या आप सौरभ जी को जानते है? नही जी, मै क्रिकेटर सौरभ गांगुली की बात नही कर रहा हूं. आप कहेगें फिर कौन सा सौरभ? दुनिया मे सौरभ जाने कितने ही होगें, एक तो मै खुद ही हूं. अब किस के बारे मे बात करें? परेशान मत होईये. मै आज आपको अपने खुद के बारे मे बता कर झिलाने के मूड़ मे कतई नही हूं. चलिये छोड़िये सौरभ जी को, यह बताईये कि आप मनोज कुमार जी के बारे मे तो जानते ही होगे? नही? सोमनाथ जी, जोगिंदर जी, निर्मलजीत सिंह जी, गुरुबचन जी..अब कुछ याद आया? चलिये एक आखिरी कोशिश करते है. शैतानजी और अब्दुल जी के बारे मे आप क्या जानते है? कुछ याद नही आ रहा. परेशान न होए, कोई बात नही. शिल्पा शेट्टी तो याद है न? बस यही काफी है. सच मे अब किस-किस को याद रखे. दुनिया है, चलती रहती है. लोग आते है, चले जाते है. अब इस मे परेशान होने की क्या बात है. जब दुनिया नश्वर है, उससे पैदा हुए हो, तो कैसे आशा रख सकते हो कि तुम अमर रहोगे? ...