सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

नवंबर, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उजड़े चमन मे कौओं की बीट

जिन्दगी हर पल आसान होती तो शायद किसी और नाम से जानी जाती. और जिन्दगी भी किस की—हम जैसे लोगों की, जो मुसीबत के नियमित ग्राहक ठहरे. मुसीबत दुनिया के किसी कोने से शुरू हो, बिना हम से मिले उसे चैन ही न मिलता. कही न कही से ढूंढ ही लेती है. क्या सुनाए आपको अपना दुखड़ा? कहाँ से शुरू करुँ? शब्द नहीं है हालात बयाँ करने के लिये. वैसे भी अब यादों के मवाद निकालने के अलावा और क्या काम रह जाता है. दो हफ़्ते घर से बाहर क्या गया मेरे बसे-बसाए खिलते हुए चमन को किसी की नजर लग गई. लौट कर उस मनहूस सुबह रोज के नियम की तरह बालकनी में जा कर जब अँगड़ाई ली तो लगा जैसे पैरो तले जमीन खिसक गई हो. चश्मा पहन कर और दूरबीन से आँखें फाड़-फाड़कर देखने पर भी हालात में न कुछ सुधार होना था और न ही हुआ. मेरा दिल धक्क रह गया. आँखों के आगे अन्धेरा छा गया, गला सूख गया और मैं सर पकड़ कर बैठ गया. जो नहीं होना चाहिए था वह हो चुका था. सब कुछ लुट चुका था. वह मंजर मेरे लिये किसी त्रासदी से काम न था. घर के सामने शादी की विदाई बाद वाला मायूस दृश्य साकार था. मुहल्ले की कटी हुई नाक टुकड़ों में बिखरी पड़ी थी. जिसके स्...