अपनी पिछली पंचवर्षीय योजना के तहत जब मैने घर की संसद मे अपने ब्लोग को शुरू करने की अर्जी दी थी तो मुझे जरा सा भी अंदेशा नही था कि मेरा यह क्रांतिकारी कदम मुझे किसी दोराहे पर पहुँचा देगा।
क़ैसे भूल जाऊँ उस महान क्षण को जिसने मेरी जिन्दगी और मेरे घर के इतिहास को एक नया मोड़ प्रदान किया था। कितनी दिक्कतो से गुजरने के बाद मेरे हिन्दी के ब्लोग ने जिन्दगी की किरण देखी थी। एक थका देने वाली लम्बी अनुमोदन प्रक्रिया—जिसमे घर के हर सदस्य से “अन-आपत्ति” प्रमाणपत्र लेकर उसको घर की संसद मे बहुमत (यानी की बहुओ के मत)से पारित करना शामिल था—से गुजरने के बाद एक लंबी नियमावली मेरे हाथ मे थमा दी गई थी। मैं क्या लिख सकता हूं, कितना लिख सकता हूं, कब लिख सकता हूं और किसके बारे मे लिख सकता हूं—यह सब मुझे “छोटा बच्चा जान कर” उस नियमावली मे विस्तार से समझाया गया था।
पत्नीजी ने भी इस मौके का राजनीतिक लाभ लेने मे कोई कंजूसी नही दिखाई। सरकारी ‘सर्वशिक्षा अभियान’ की तर्ज़ पर मुझे पढ़ाने और लिखाने का दौर जो शुरू हुआ वो मेरी दो-तीन महीनो की तनख्वाह की अंतेष्ठी कर के ही खत्म हुआ। नतीजन, मै लिखने तो लगा पर मेरा लिखा कभी मुझे ही समझ मे नही आया कि क्या लिखा है और क्यूँ लिखा है। पत्नीजी ने मामले को रफा-दफा करते हुये मुझे हौंसला दिया, “लिखने की भी कोई वजह होती है क्या? तुम तो सिर्फ लिखने के मकसद से लिखो. वजह और अनगिनत मतलब निकालने का काम पढ़ने वालो का होता है, यह काम तुम उन पर ही छोड़ो. तुम लिखने वालो की उच्च श्रेणी के होते हुये भी समझाने वालो की निचली श्रेणी मे क्यूँ जाना चाहते हो?” अक्सर ऐसी गहरी बाते कह कर मुझे पेड़ पर चढाने की खासियत पत्नीजी की रही है पर इस बार मुझे समझ मे आ ही गया कि हर वेवकूफ नही लिख सकता, लिखने की हिम्मत तो कुछ खास तरह के मूर्ख लोग ही कर सकते है। हमने राहत की सांस ली, मूर्खता मे तो हम हमेशा ही अव्वल रहे है। देर आये, दुरस्त आये। आज यह हुनर भी काम मे आ गया। मन मे संतोष था कि अब हम भी मूर्खो की अव्वल श्रेणी मे शामिल होने जा रहे है।
पर कुछ अहम मुद्दो पर आम सहमति होना अभी बाकी थी। रोकर, झींककर, गिड़गिड़ाकर मैने पत्नीजी से हिन्दी मे लिखने की स्वीकृति ले ही ली। पत्नीजी ने अनमने मन से स्वीकृति तो दी पर उसके साथ-साथ एक धमकीनुमा सुझाव भी दे डाला, “हिन्दी ऐसी लिखना कि उसमे से कट्टरपंथ और भारतीय इतिहास की बू न आये, वरना जनतंत्र मे तुम्हारा बैंड़-बाजा बजते देर नही लगेगी।” बात का सारांश यह था कि मुझे हिन्दी भी अंग्रेजी मे लिखनी आनी चाहिये। मेरी हिन्दी-लेखन क्षमता को उभारने के लिये अंग्रेजी के महान विद्दानो को न्यौता भेजा गया। मेरी सुसंस्क़ृत पत्नीजी ने मुझे समझाया कि आजकल हर मौके-बैमोको पर अंग्रेजी मे हिन्दी की पैरवी करने का ठेका इन्ही लोगों के पास है। इन लोगो ने हिन्दी के उत्थान के लिए हिन्दी समाचार पत्रो को भी अंग्रेजी मे छापना शुरू कर दिया है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी से जुड़ सके। मेरा परम सौभाग्य कि मुझे ऐसे ज्ञानीयो का सानिध्य मिला। अगर ये ना मिलते तो मुझे पता ही नही चलता कि हिन्दी जैसी भाषा अभी तक संसार मे जीवित है और अंग्रेजी की आँक्सीजन के दम पर 21वी सदी मे दुनिया पर राज करने का सपना देख रही है। अंग्रेजी मे लिखी हुई हिन्दी व्याकरण की पुस्तक ने मेरे ज्ञान-चक्षुओ मे एक अलौकिक दिव्य ज्योति का प्रकाश उत्पन्न किया। दीक्षा के उपरांत हुई लिखित परीक्षा मे भी मैने जैसे-तैसे नकल मारकर सफलता प्राप्त कर ही ली।
भाषा ज्ञान प्राप्त करने के बाद अब अगला चरण था—विषय खोज का। यह मेरे लिये थोड़ा मुश्किल काम था. पत्नीजी ने रास्ता सुझाया, “मन के जो फितूर है उनको शब्दो मे उतारो और बाद मे उसको मुद्दा बना दो. अगर पहाड़ के बारे मे नही लिख सकते तो चिल्ला-चिल्ला कर राई को ही पहाड़ बनाओ. ज्यादा है तो कुछ चेले-चपाटे रख लो जो तुम्हारे नाम और गुणो का कीर्तन करते रहे। आजकल सब इसी की ही तो रोटी खाते है।” पत्नीजी मे वाकई ज्ञान कूट-कूट कर भरा हुआ था।
बात यही खत्म नही होती। अब इन चेले-चपाटो को कहाँ से पैदा करूँ—यही सोच-सोच कर दुबला हुआ जा रहा हूँ। इस मामले पर अगर आप कुछ ज्ञान दे सके या मदद कर सके तो एक लेखक की आत्मा का भला हो जाये और पूरी ब्लोग बिरादरी भविष्य के एक महान लेखक को हमेशा-हमेशा के लिये खोने से बच जायेगी, वरना आने वाली पीढ़ीयाँ हिन्दी साहित्य के इस भारी नुकसान के लिये सिर्फ और सिर्फ आप लोगो को ही जिम्मेदार मानेगी। क्या उठा पाओगे आप इस ब्लोग-ग्लानि का बोझ?
क़ैसे भूल जाऊँ उस महान क्षण को जिसने मेरी जिन्दगी और मेरे घर के इतिहास को एक नया मोड़ प्रदान किया था। कितनी दिक्कतो से गुजरने के बाद मेरे हिन्दी के ब्लोग ने जिन्दगी की किरण देखी थी। एक थका देने वाली लम्बी अनुमोदन प्रक्रिया—जिसमे घर के हर सदस्य से “अन-आपत्ति” प्रमाणपत्र लेकर उसको घर की संसद मे बहुमत (यानी की बहुओ के मत)से पारित करना शामिल था—से गुजरने के बाद एक लंबी नियमावली मेरे हाथ मे थमा दी गई थी। मैं क्या लिख सकता हूं, कितना लिख सकता हूं, कब लिख सकता हूं और किसके बारे मे लिख सकता हूं—यह सब मुझे “छोटा बच्चा जान कर” उस नियमावली मे विस्तार से समझाया गया था।
पत्नीजी ने भी इस मौके का राजनीतिक लाभ लेने मे कोई कंजूसी नही दिखाई। सरकारी ‘सर्वशिक्षा अभियान’ की तर्ज़ पर मुझे पढ़ाने और लिखाने का दौर जो शुरू हुआ वो मेरी दो-तीन महीनो की तनख्वाह की अंतेष्ठी कर के ही खत्म हुआ। नतीजन, मै लिखने तो लगा पर मेरा लिखा कभी मुझे ही समझ मे नही आया कि क्या लिखा है और क्यूँ लिखा है। पत्नीजी ने मामले को रफा-दफा करते हुये मुझे हौंसला दिया, “लिखने की भी कोई वजह होती है क्या? तुम तो सिर्फ लिखने के मकसद से लिखो. वजह और अनगिनत मतलब निकालने का काम पढ़ने वालो का होता है, यह काम तुम उन पर ही छोड़ो. तुम लिखने वालो की उच्च श्रेणी के होते हुये भी समझाने वालो की निचली श्रेणी मे क्यूँ जाना चाहते हो?” अक्सर ऐसी गहरी बाते कह कर मुझे पेड़ पर चढाने की खासियत पत्नीजी की रही है पर इस बार मुझे समझ मे आ ही गया कि हर वेवकूफ नही लिख सकता, लिखने की हिम्मत तो कुछ खास तरह के मूर्ख लोग ही कर सकते है। हमने राहत की सांस ली, मूर्खता मे तो हम हमेशा ही अव्वल रहे है। देर आये, दुरस्त आये। आज यह हुनर भी काम मे आ गया। मन मे संतोष था कि अब हम भी मूर्खो की अव्वल श्रेणी मे शामिल होने जा रहे है।
पर कुछ अहम मुद्दो पर आम सहमति होना अभी बाकी थी। रोकर, झींककर, गिड़गिड़ाकर मैने पत्नीजी से हिन्दी मे लिखने की स्वीकृति ले ही ली। पत्नीजी ने अनमने मन से स्वीकृति तो दी पर उसके साथ-साथ एक धमकीनुमा सुझाव भी दे डाला, “हिन्दी ऐसी लिखना कि उसमे से कट्टरपंथ और भारतीय इतिहास की बू न आये, वरना जनतंत्र मे तुम्हारा बैंड़-बाजा बजते देर नही लगेगी।” बात का सारांश यह था कि मुझे हिन्दी भी अंग्रेजी मे लिखनी आनी चाहिये। मेरी हिन्दी-लेखन क्षमता को उभारने के लिये अंग्रेजी के महान विद्दानो को न्यौता भेजा गया। मेरी सुसंस्क़ृत पत्नीजी ने मुझे समझाया कि आजकल हर मौके-बैमोको पर अंग्रेजी मे हिन्दी की पैरवी करने का ठेका इन्ही लोगों के पास है। इन लोगो ने हिन्दी के उत्थान के लिए हिन्दी समाचार पत्रो को भी अंग्रेजी मे छापना शुरू कर दिया है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी से जुड़ सके। मेरा परम सौभाग्य कि मुझे ऐसे ज्ञानीयो का सानिध्य मिला। अगर ये ना मिलते तो मुझे पता ही नही चलता कि हिन्दी जैसी भाषा अभी तक संसार मे जीवित है और अंग्रेजी की आँक्सीजन के दम पर 21वी सदी मे दुनिया पर राज करने का सपना देख रही है। अंग्रेजी मे लिखी हुई हिन्दी व्याकरण की पुस्तक ने मेरे ज्ञान-चक्षुओ मे एक अलौकिक दिव्य ज्योति का प्रकाश उत्पन्न किया। दीक्षा के उपरांत हुई लिखित परीक्षा मे भी मैने जैसे-तैसे नकल मारकर सफलता प्राप्त कर ही ली।
भाषा ज्ञान प्राप्त करने के बाद अब अगला चरण था—विषय खोज का। यह मेरे लिये थोड़ा मुश्किल काम था. पत्नीजी ने रास्ता सुझाया, “मन के जो फितूर है उनको शब्दो मे उतारो और बाद मे उसको मुद्दा बना दो. अगर पहाड़ के बारे मे नही लिख सकते तो चिल्ला-चिल्ला कर राई को ही पहाड़ बनाओ. ज्यादा है तो कुछ चेले-चपाटे रख लो जो तुम्हारे नाम और गुणो का कीर्तन करते रहे। आजकल सब इसी की ही तो रोटी खाते है।” पत्नीजी मे वाकई ज्ञान कूट-कूट कर भरा हुआ था।
बात यही खत्म नही होती। अब इन चेले-चपाटो को कहाँ से पैदा करूँ—यही सोच-सोच कर दुबला हुआ जा रहा हूँ। इस मामले पर अगर आप कुछ ज्ञान दे सके या मदद कर सके तो एक लेखक की आत्मा का भला हो जाये और पूरी ब्लोग बिरादरी भविष्य के एक महान लेखक को हमेशा-हमेशा के लिये खोने से बच जायेगी, वरना आने वाली पीढ़ीयाँ हिन्दी साहित्य के इस भारी नुकसान के लिये सिर्फ और सिर्फ आप लोगो को ही जिम्मेदार मानेगी। क्या उठा पाओगे आप इस ब्लोग-ग्लानि का बोझ?
टिप्पणियाँ
आप मूल भूत गलती कर रहे हैं...ब्लॉग जगत में चेले नहीं मिलते गुरु घंटाल मिलते हैं...यहाँ क्या है की पहले आप किसी को गुरु कहो बदले में वो आप को गुरु कहने लग जाएगा...जैसा देश वैसा भेष अपनाईये और कष्ट से निवारण पाईये...मजाक की बात छोडें और सच कहें तो आपने बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है, शब्दों और विचारों का अद्भुत संगम है आप के पास.
नीरज
@ नीरज जी, आपके सुझाव का बहुत-बहुत धन्यवाद. मैने आपके सुझावो को अमल मे लाने के लिये एक समिति का गठन कर दिया. बस परिणाम आने का इंतजार है और उसके बाद चेले-चपाटो की धर-पकड़ शुरू हो जायेगी.
tussi to gr8 ho..hum to aapke pahle se hi fan the..ab to kadrdaan ho gaye hain..aap hukum kariye...hum bajaa farmayeenge....itna bada blogistan ka nuksaan hum bardashat nahin kar sakte..:)
anuj kapoor