अपनी पिछली पंचवर्षीय योजना के तहत जब मैने घर की संसद मे अपने ब्लोग को शुरू करने की अर्जी दी थी तो मुझे जरा सा भी अंदेशा नही था कि मेरा यह क्रांतिकारी कदम मुझे किसी दोराहे पर पहुँचा देगा। क़ैसे भूल जाऊँ उस महान क्षण को जिसने मेरी जिन्दगी और मेरे घर के इतिहास को एक नया मोड़ प्रदान किया था। कितनी दिक्कतो से गुजरने के बाद मेरे हिन्दी के ब्लोग ने जिन्दगी की किरण देखी थी। एक थका देने वाली लम्बी अनुमोदन प्रक्रिया—जिसमे घर के हर सदस्य से “अन-आपत्ति” प्रमाणपत्र लेकर उसको घर की संसद मे बहुमत (यानी की बहुओ के मत)से पारित करना शामिल था—से गुजरने के बाद एक लंबी नियमावली मेरे हाथ मे थमा दी गई थी। मैं क्या लिख सकता हूं, कितना लिख सकता हूं, कब लिख सकता हूं और किसके बारे मे लिख सकता हूं—यह सब मुझे “छोटा बच्चा जान कर” उस नियमावली मे विस्तार से समझाया गया था। पत्नीजी ने भी इस मौके का राजनीतिक लाभ लेने मे कोई कंजूसी नही दिखाई। सरकारी ‘सर्वशिक्षा अभियान’ की तर्ज़ पर मुझे पढ़ाने और लिखाने का दौर जो शुरू हुआ वो मेरी दो-तीन महीनो की तनख्वाह की अंतेष्ठी कर के ही खत्म हुआ। नतीजन, मै लिखने तो लगा पर मेरा लिखा ...