अमर होने का फार्मूला तैयार है और मार्केट मे सहज उपलब्ध है. क्या आप इस्तेमाल करना चाहेगे? जरा एक नजर ड़ाले इसके गुणो पर और जानिये कि कैसे ये फार्मूला ब्लोग जगत को हिलाने की तैयारी कर रहा है.
क्या आप सौरभ जी को जानते है? नही जी, मै क्रिकेटर सौरभ गांगुली की बात नही कर रहा हूं. आप कहेगें फिर कौन सा सौरभ? दुनिया मे सौरभ जाने कितने ही होगें, एक तो मै खुद ही हूं. अब किस के बारे मे बात करें? परेशान मत होईये. मै आज आपको अपने खुद के बारे मे बता कर झिलाने के मूड़ मे कतई नही हूं. चलिये छोड़िये सौरभ जी को, यह बताईये कि आप मनोज कुमार जी के बारे मे तो जानते ही होगे? नही? सोमनाथ जी, जोगिंदर जी, निर्मलजीत सिंह जी, गुरुबचन जी..अब कुछ याद आया? चलिये एक आखिरी कोशिश करते है. शैतानजी और अब्दुल जी के बारे मे आप क्या जानते है? कुछ याद नही आ रहा. परेशान न होए, कोई बात नही. शिल्पा शेट्टी तो याद है न? बस यही काफी है.
सच मे अब किस-किस को याद रखे. दुनिया है, चलती रहती है. लोग आते है, चले जाते है. अब इस मे परेशान होने की क्या बात है. जब दुनिया नश्वर है, उससे पैदा हुए हो, तो कैसे आशा रख सकते हो कि तुम अमर रहोगे? वैसे भी याद रखने मे जितने झमेले होते है उससे मुकाबले मे भूल जाना कही ज्यादा आसान रहता है. याद रखने से ज्यादा भूलना महत्वपूर्ण है. जब तक पुराना भूलोगे नही, नया कैसे याद होगा.
मजेदार बात यह है कि भूलने से कम से कम नये लोगो को मौका मिल जाता है नाम कमाने का. मिलना भी चाहिये. और पुराने? नाम कमा लेने के बाद तो वो वैसे भी अमर हो जाते है, तो फिर नश्वर दुनिया मे उनका क्या काम. प्रयास करना चाहिये कि अगर कोई नाम कमा चुका हो तो उसको फौरन अमर घोषित कर दिया जाये. एक के अमर होने के बाद, दूसरो को भी प्रोत्साहन मिल जाता है.
आप तो बस अमर होने का प्रयास करें, कोई कसर रह जायेगी तो लोग मिल कर पूरी कर देगे. सरकारे तो वैसे भी इस तरह के किसी प्रयासो को भरपूर प्रोत्साहन देती है. ज्यादा होगा तो इस मामले मे कोई स्कीम भी निकाली जा सकती है. जैसे, घर के किसी एक सदस्य के अमर घोषित होने पर बाकी के सदस्यो को सरकारी खर्चे मे मार कर अमरता प्रदान कर दी जाये. ऐसा नही है कि ऐसी व्यवस्था आज नही है, बिल्कुल है, पर बहुत महँगी. अमरता को जन-सुलभ बनाने के लिये ऐसी और स्कीमो की सख्त जरूरत है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग कम समय मे अमर हो सके.
वित्त-मंत्रालय ‘अमरता टेक्स’ के नाम पर सरकारी खजाने मे और इजाफा करने की सोच सकता है. अगर सर्वसम्मति बनी तो सरकार ऐसे अमर लोगों को अल्पसंख्यक या फिर अनुसूचित जातियो मे डाल कर आरक्षण भी दे सकती है. आजकल तो ऐसे अमर लोगों के नाम पर राशन कार्ड और जमीने भी मिल जाती है. अब जब इतना होगा तो जरूरी है ऐसे लोगों को वोटिग अधिकार भी दिये जाये. अरे, अब वोट के लिये मरे और जिन्दा लोगों मे क्या फर्क करना. लोगों की परवाह अब भी नही है, तब भी नही होगी. जिन्दा नही सम्भल रहे तो क्या हुआ, उन्हें मार कर अमर बनाकर सम्भालना ज्यादा आसान होता है. कोई दिक्कत नही आयेगी. आप बस सतत प्रयास जारी रखे अमर होने के लिये.
कितना स्वर्णिम युग होगा. नेता लोग अपने भाषण मे कहा करेगे, “...फलां-फलां सरकार के पूरे कार्यकाल मे इतने लोग अमर नही हुये, जितने हमने दो महीनो मे कर दिखाये...”. फिल्मो मे जिस तरह आज लिखा होता है “सिर्फ व्यस्को के लिये”, तब लिखा होगा, “सिर्फ अमर लोगों के लिये”. फिल्म देखनी हो तो पहले अमर हो कर आओ. चैनल वालो की तो लोटरी ही लग जायेगी. मौसम, खेल और राजनीतिक समाचारो की तरह अमर लोगों के लिये समाचार का भी एक अलग कवरेज होगा. आज कितने लोग अमर हुए, किस धरम से हुए, कल कितने होगे, कहाँ से होगे, वगैरह, वगैरह.
सबसे ज्यादा खुशी तो तब होगी जब अमेरिका भारत के आगे घुटने टेक, हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा होगा, “प्लीज, तुमको तुम्हारे भगवान का वास्ता, हमको अमर होने का तरीका बताओ”. हाय, सच मे इंतजार नही हो रहा. ऐसा लग रहा है बस अभी ही अमर हो जाऊँ. कित्ता मजा आयेगा, नही?
अमर लोगों की अलग कौम होगी, अलग धर्म होगा और पूजा के लिये अलग स्थान भी होगा. ब्लोग जगत तो मानो हिला जाएगा अमरता के इस क्रांतिकारी विचार से. घोषणाए होगी, “...फलां-फलां जी को इस साल का अमर ब्लोगर चुना गया है. भले इंसान थे आगे भी आपके लिये भले ही बने रहे इसलिये उनके ब्लोग के अंतिम दर्शन करने के साथ-साथ अपनी टिप्पणी डालना न भूले”. बताईये, अब कौन ऐसा बेशरम होगा ब्लोग जगत मे जो अमर हो जाने के लिये तैयार खडे आदमी के लिये एक टिप्पणी भी न डाल पाये? आखिर एक न एक दिन उसे भी तो अमर होना है. कितना बुरा लगेगा उसे अपने बारे मे सुनकर कि “...फलां-फलां जी की अमरता दूसरे फलां-फलां जी के सामने फीकी पड़ गई”, या फिर, “यह अमर होना भी कोई अमर होना है, सिर्फ 10 लोगो ने टिप्पणी करी और वो 10 भी घर के ही थे”, या, “सिर्फ दो टिप्पणीया आई थी इसीलिये अमर होने के लिये एक और कोशिश करेगे”. अब ये अमर होने से पहले चूल्लू-भर पानी मे डूबने वाली बात नही हुई तो क्या हुई?
और शायद तब हमको महसूस हो कि हम अमर होने के बाद मरे हुओ से कही गुना ज्यादा गये बीते हो गये है. हम अमर तो हो जायेगे, पर अमरता के सही पैमाने कभी न समझ पायेगे. अरे जिन लोगों के सामने अमरता भी बौनी पड़ जाती है जब हम उन्ही को नही पहचान पाते है तो और क्या किसी चीज की उम्मीद रखे? हमारे अमर होने के पैमानो पर सौरभ, मनोज, सोमनाथ, जोगिंदर, निर्मलजीत, गुरुबचन, शैतान और अब्दुल जैसे लोग शायद ही कभी खरे उतरे. और जिन पैमानो पर वो सब अमर हुए उसको समझने मे हमको थोड़ी दिक्कत आये. आखिर यह सभी अमर हुये भी तो किसके लिये—क्या सिर्फ एक परमवीर-चक्र और अपने लिये हमेशा के लिये एक कचोटती गुमनामी के लिये? आखिर क्यों? कितना कठिन है यह सब समझना और समझाना—अमर हो जाने के रहस्य से पर्दा हटाने से भी कई लाख गुना ज्यादा कठिन.
तो क्या तैयार है आप अमर होने के लिये?
क्या आप सौरभ जी को जानते है? नही जी, मै क्रिकेटर सौरभ गांगुली की बात नही कर रहा हूं. आप कहेगें फिर कौन सा सौरभ? दुनिया मे सौरभ जाने कितने ही होगें, एक तो मै खुद ही हूं. अब किस के बारे मे बात करें? परेशान मत होईये. मै आज आपको अपने खुद के बारे मे बता कर झिलाने के मूड़ मे कतई नही हूं. चलिये छोड़िये सौरभ जी को, यह बताईये कि आप मनोज कुमार जी के बारे मे तो जानते ही होगे? नही? सोमनाथ जी, जोगिंदर जी, निर्मलजीत सिंह जी, गुरुबचन जी..अब कुछ याद आया? चलिये एक आखिरी कोशिश करते है. शैतानजी और अब्दुल जी के बारे मे आप क्या जानते है? कुछ याद नही आ रहा. परेशान न होए, कोई बात नही. शिल्पा शेट्टी तो याद है न? बस यही काफी है.
सच मे अब किस-किस को याद रखे. दुनिया है, चलती रहती है. लोग आते है, चले जाते है. अब इस मे परेशान होने की क्या बात है. जब दुनिया नश्वर है, उससे पैदा हुए हो, तो कैसे आशा रख सकते हो कि तुम अमर रहोगे? वैसे भी याद रखने मे जितने झमेले होते है उससे मुकाबले मे भूल जाना कही ज्यादा आसान रहता है. याद रखने से ज्यादा भूलना महत्वपूर्ण है. जब तक पुराना भूलोगे नही, नया कैसे याद होगा.
मजेदार बात यह है कि भूलने से कम से कम नये लोगो को मौका मिल जाता है नाम कमाने का. मिलना भी चाहिये. और पुराने? नाम कमा लेने के बाद तो वो वैसे भी अमर हो जाते है, तो फिर नश्वर दुनिया मे उनका क्या काम. प्रयास करना चाहिये कि अगर कोई नाम कमा चुका हो तो उसको फौरन अमर घोषित कर दिया जाये. एक के अमर होने के बाद, दूसरो को भी प्रोत्साहन मिल जाता है.
आप तो बस अमर होने का प्रयास करें, कोई कसर रह जायेगी तो लोग मिल कर पूरी कर देगे. सरकारे तो वैसे भी इस तरह के किसी प्रयासो को भरपूर प्रोत्साहन देती है. ज्यादा होगा तो इस मामले मे कोई स्कीम भी निकाली जा सकती है. जैसे, घर के किसी एक सदस्य के अमर घोषित होने पर बाकी के सदस्यो को सरकारी खर्चे मे मार कर अमरता प्रदान कर दी जाये. ऐसा नही है कि ऐसी व्यवस्था आज नही है, बिल्कुल है, पर बहुत महँगी. अमरता को जन-सुलभ बनाने के लिये ऐसी और स्कीमो की सख्त जरूरत है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग कम समय मे अमर हो सके.
वित्त-मंत्रालय ‘अमरता टेक्स’ के नाम पर सरकारी खजाने मे और इजाफा करने की सोच सकता है. अगर सर्वसम्मति बनी तो सरकार ऐसे अमर लोगों को अल्पसंख्यक या फिर अनुसूचित जातियो मे डाल कर आरक्षण भी दे सकती है. आजकल तो ऐसे अमर लोगों के नाम पर राशन कार्ड और जमीने भी मिल जाती है. अब जब इतना होगा तो जरूरी है ऐसे लोगों को वोटिग अधिकार भी दिये जाये. अरे, अब वोट के लिये मरे और जिन्दा लोगों मे क्या फर्क करना. लोगों की परवाह अब भी नही है, तब भी नही होगी. जिन्दा नही सम्भल रहे तो क्या हुआ, उन्हें मार कर अमर बनाकर सम्भालना ज्यादा आसान होता है. कोई दिक्कत नही आयेगी. आप बस सतत प्रयास जारी रखे अमर होने के लिये.
कितना स्वर्णिम युग होगा. नेता लोग अपने भाषण मे कहा करेगे, “...फलां-फलां सरकार के पूरे कार्यकाल मे इतने लोग अमर नही हुये, जितने हमने दो महीनो मे कर दिखाये...”. फिल्मो मे जिस तरह आज लिखा होता है “सिर्फ व्यस्को के लिये”, तब लिखा होगा, “सिर्फ अमर लोगों के लिये”. फिल्म देखनी हो तो पहले अमर हो कर आओ. चैनल वालो की तो लोटरी ही लग जायेगी. मौसम, खेल और राजनीतिक समाचारो की तरह अमर लोगों के लिये समाचार का भी एक अलग कवरेज होगा. आज कितने लोग अमर हुए, किस धरम से हुए, कल कितने होगे, कहाँ से होगे, वगैरह, वगैरह.
सबसे ज्यादा खुशी तो तब होगी जब अमेरिका भारत के आगे घुटने टेक, हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा होगा, “प्लीज, तुमको तुम्हारे भगवान का वास्ता, हमको अमर होने का तरीका बताओ”. हाय, सच मे इंतजार नही हो रहा. ऐसा लग रहा है बस अभी ही अमर हो जाऊँ. कित्ता मजा आयेगा, नही?
अमर लोगों की अलग कौम होगी, अलग धर्म होगा और पूजा के लिये अलग स्थान भी होगा. ब्लोग जगत तो मानो हिला जाएगा अमरता के इस क्रांतिकारी विचार से. घोषणाए होगी, “...फलां-फलां जी को इस साल का अमर ब्लोगर चुना गया है. भले इंसान थे आगे भी आपके लिये भले ही बने रहे इसलिये उनके ब्लोग के अंतिम दर्शन करने के साथ-साथ अपनी टिप्पणी डालना न भूले”. बताईये, अब कौन ऐसा बेशरम होगा ब्लोग जगत मे जो अमर हो जाने के लिये तैयार खडे आदमी के लिये एक टिप्पणी भी न डाल पाये? आखिर एक न एक दिन उसे भी तो अमर होना है. कितना बुरा लगेगा उसे अपने बारे मे सुनकर कि “...फलां-फलां जी की अमरता दूसरे फलां-फलां जी के सामने फीकी पड़ गई”, या फिर, “यह अमर होना भी कोई अमर होना है, सिर्फ 10 लोगो ने टिप्पणी करी और वो 10 भी घर के ही थे”, या, “सिर्फ दो टिप्पणीया आई थी इसीलिये अमर होने के लिये एक और कोशिश करेगे”. अब ये अमर होने से पहले चूल्लू-भर पानी मे डूबने वाली बात नही हुई तो क्या हुई?
और शायद तब हमको महसूस हो कि हम अमर होने के बाद मरे हुओ से कही गुना ज्यादा गये बीते हो गये है. हम अमर तो हो जायेगे, पर अमरता के सही पैमाने कभी न समझ पायेगे. अरे जिन लोगों के सामने अमरता भी बौनी पड़ जाती है जब हम उन्ही को नही पहचान पाते है तो और क्या किसी चीज की उम्मीद रखे? हमारे अमर होने के पैमानो पर सौरभ, मनोज, सोमनाथ, जोगिंदर, निर्मलजीत, गुरुबचन, शैतान और अब्दुल जैसे लोग शायद ही कभी खरे उतरे. और जिन पैमानो पर वो सब अमर हुए उसको समझने मे हमको थोड़ी दिक्कत आये. आखिर यह सभी अमर हुये भी तो किसके लिये—क्या सिर्फ एक परमवीर-चक्र और अपने लिये हमेशा के लिये एक कचोटती गुमनामी के लिये? आखिर क्यों? कितना कठिन है यह सब समझना और समझाना—अमर हो जाने के रहस्य से पर्दा हटाने से भी कई लाख गुना ज्यादा कठिन.
तो क्या तैयार है आप अमर होने के लिये?
टिप्पणियाँ
मुझसे गलती हो गई, पैदाईशी अमर भाईयो को तो मैं भूल ही गया था. चलिये आपके लिये डिस्काउंट की अलग व्यवस्था रहेगी.
(अच्छी पोस्ट)
अच्छी कल्पना..
अमरता के बहाने आपने कटु सत्य को उघाडा है। इस जीवंत पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारें।