टीवी बन्द करके मैने अपने बगल मे लेटी हुई एकलौती पत्नी जी पर नजर डाली। बिस्तर की वास्तविक नियंत्रण रेखा का रोज की तरह उलंघन हो चुका था और मेरे पास सिवाए विरोध दर्ज कराने की पारम्पारिक परम्परा का निर्वाह करने के अलावा और कोई चारा नही था। विरोध दर्ज कराने से समस्या का हल तो नही निकलता पर इसी बहाने से कम से कम घर मे कुछ बोलने का मौका जरूर मिल जाता है।
सुरसा की तरह मुँह फाडे, देश की सरकार की तरह कान मे तेल डाले, और शेयर बाजार की तरह् औंधी लेटी हुई अपनी पत्नी जी से अपने इलाके से हट जाने का नम्र निवेदन करने की भी मेरी हिम्मत नही हुई। कही पत्नी जी ब्लूलाईन बसो की तरह बेकाबू हो गई तो कौन करेगा मेरी रक्षा उस प्रलय की घडी मे। जनतंत्र मे मौलिक अधिकार अक्सर रद्दी के भाव बिकते है और वैसे भी मेरे सभी मौलिक अधिकार तो शादी के तुरंत बाद तत्काल प्रभाव से निष्क्रिय कर दिए गये थे।
यकीन मानिए, मै आज भी अपने शादी के घिसे-पिटी विडियो को देख कर यह जानने की कोशिश करता हूं कि क्यों, कैसे और कब पंडितजी ने मेरे मौलिक अधिकारो को अग्निदेव को समर्पित किया था। उस दुख की घडी मे न तो मुझे पूरे देश को हिला देने मानव अधिकारो की आवाज बुलंद करने वाले संगठन कही दिखाई दिये और ना हर छोटी से छोटी बात का बतंगड बनाने के हुनर मे माहिर नेता लोग। हर खबर को रबड की तरह खींचकर रख देने वाले टीवी चैनल वाले भी मौका-ए-वारदात से गायब थे। अलबत्ता तन्मयता से भोजन पर टूटे पडे कुछ जाने पहचाने और बहुत से अन्जाने रिश्तेदारो की भीड जरूर दिख रही थी, परंतु वो सब भोजन का स्वाद लेने मे इतने व्यस्थ थे कि किसी को भी मेरी हालात गौर करने लायक नहीं लगी।
शादी के बाद खर्चो के साथ-साथ अगर किसी ने मेरे अन्दर अपनी पैठ बनाई थी तो वो थी मेरी धार्मिक प्रवृति। इसका श्रेय भी मै अपनी पूज्यनीय पत्नी जी को ही देना उचित समझता हूं। शादी के बाद आधा धार्मिक तो आदमी पत्नी के हाथो से बना खाना खा-खाकर वैसे ही हो जाता है। बची-खुची धार्मिकता पत्नी जी का पौराणिक दिव्य अस्त्र अर्थात बेलन सिखा देता है। हनुमान चालीसा का ज्ञान मुझको इस दिव्य अस्त्र के सिर पर पडने के बाद ही हुआ था। तीन दिन तक प्रभु के ध्यान मे लीन रहने के पश्चात चौथे दिन मेरी आंखे खुली थी। समस्त संसार और उससे परे जगत के दुर्लभ दर्शन पत्नी जी ने जितनी सहजता से करवाए वह मैं कभी भूल नही सकता। हनुमान चालीसा तो मानो उस पल के पश्चात मेरी रग-रग मे बस गया था। अब तो मेरी दैनिक क्रियाओ मे घर मे घुसने से पहले हनुमान चालीसा का एक-दो बार पाठ करना अनिवार्य रूप से शामिल हो गया है। इस दौरान मैं कब बहुसंख्यको से अल्पसंख्यको मे, और फिर उसके बाद अनुसूचित जन जातियो मे शामिल हो गया इसके बारे मे कोई ऐतिहासिक दस्तावेज विस्तृत जानकारी जुटा नही पाया। पत्नी जी अगर इसी रफ्तार से प्रयासरत रही तो वो दिन दूर नही जब मेरा नाम भी लुप्त-प्राय प्राणियो की श्रेणी मे दर्ज हो जायेगा।
पत्नी जी जिस सफाई से मेरी दिहाडी पर हाथ साफ करती हैं वो काबिले गौर है। हमारे वित्तमंत्री जी कर-उगाही के मामले मे मेरी पत्नी जी से काफी कुछ सीख सकते है। गोया पत्नी ना हो मानो कोई जादूगर हो। आपकी आंखो के सामने आपके हाथ पर रखा सौ रुपये का नोट दस-दस के आठ नोटो मे बदल जायेगा और आपको भनक तक नही लगेगी। हालांकि जिस तरह सबूतो के अभाव मे अक्सर देश के कुटिल अपराधी छूट जाते है, मैं गरीब भी अपनी पत्नी जी का हाथ इन हरकतो मे कभी साबित नहीं कर पाया। अगर कुछ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान लोग थोडी हिम्मत करके इस मामले मे सहयोग करें तो शायद इस रहस्य पर से पर्दा उठ सके।
लाख बचाने पर भी दिन मे एक दो बार पत्नी जी पर नजर पड ही जाती है। कभी-कभी नजर मिलने पर पत्नी जी मेरी तरफ अपनी दुर्लभ मुस्कुराहट फेंक देती है। सच कहूं तो उनकी हंसी को देखकर अकसर मैं सहम जाता हूं। परिपक्व नेताओ की तरह मेरी माननीय पत्नी जी भी कभी बेवजह नही हंसती है। अकसर उस मुसकुराहट की कीमत मुझको कभी अधपकी रोटी या प्रेस से जली हुई कमीज से चुकानी पडती है। मेरा छोटा सा ईंसानी दिमाग उस रह्स्यमय मुसकुराहट की वजह को खोजने के प्रयास मे कई बार बंद पड चुका है।
खैर, मन मे हनुमान चालीसा का जाप करते हुये, कांपते हाथो से मैने अपनी पत्नी जी को बिस्तर के अपने ईलाके से खिसकाना शुरू किया। वैसे आज हालात इतने बुरे नहीं थे। पत्नी जी ने शायद रहम करके, या फिर गलती से, तकिया और चादर पर अभी अपना कब्जा नही जमाया था।
© सर्वाधिकार सुरक्षित
सुरसा की तरह मुँह फाडे, देश की सरकार की तरह कान मे तेल डाले, और शेयर बाजार की तरह् औंधी लेटी हुई अपनी पत्नी जी से अपने इलाके से हट जाने का नम्र निवेदन करने की भी मेरी हिम्मत नही हुई। कही पत्नी जी ब्लूलाईन बसो की तरह बेकाबू हो गई तो कौन करेगा मेरी रक्षा उस प्रलय की घडी मे। जनतंत्र मे मौलिक अधिकार अक्सर रद्दी के भाव बिकते है और वैसे भी मेरे सभी मौलिक अधिकार तो शादी के तुरंत बाद तत्काल प्रभाव से निष्क्रिय कर दिए गये थे।
यकीन मानिए, मै आज भी अपने शादी के घिसे-पिटी विडियो को देख कर यह जानने की कोशिश करता हूं कि क्यों, कैसे और कब पंडितजी ने मेरे मौलिक अधिकारो को अग्निदेव को समर्पित किया था। उस दुख की घडी मे न तो मुझे पूरे देश को हिला देने मानव अधिकारो की आवाज बुलंद करने वाले संगठन कही दिखाई दिये और ना हर छोटी से छोटी बात का बतंगड बनाने के हुनर मे माहिर नेता लोग। हर खबर को रबड की तरह खींचकर रख देने वाले टीवी चैनल वाले भी मौका-ए-वारदात से गायब थे। अलबत्ता तन्मयता से भोजन पर टूटे पडे कुछ जाने पहचाने और बहुत से अन्जाने रिश्तेदारो की भीड जरूर दिख रही थी, परंतु वो सब भोजन का स्वाद लेने मे इतने व्यस्थ थे कि किसी को भी मेरी हालात गौर करने लायक नहीं लगी।
शादी के बाद खर्चो के साथ-साथ अगर किसी ने मेरे अन्दर अपनी पैठ बनाई थी तो वो थी मेरी धार्मिक प्रवृति। इसका श्रेय भी मै अपनी पूज्यनीय पत्नी जी को ही देना उचित समझता हूं। शादी के बाद आधा धार्मिक तो आदमी पत्नी के हाथो से बना खाना खा-खाकर वैसे ही हो जाता है। बची-खुची धार्मिकता पत्नी जी का पौराणिक दिव्य अस्त्र अर्थात बेलन सिखा देता है। हनुमान चालीसा का ज्ञान मुझको इस दिव्य अस्त्र के सिर पर पडने के बाद ही हुआ था। तीन दिन तक प्रभु के ध्यान मे लीन रहने के पश्चात चौथे दिन मेरी आंखे खुली थी। समस्त संसार और उससे परे जगत के दुर्लभ दर्शन पत्नी जी ने जितनी सहजता से करवाए वह मैं कभी भूल नही सकता। हनुमान चालीसा तो मानो उस पल के पश्चात मेरी रग-रग मे बस गया था। अब तो मेरी दैनिक क्रियाओ मे घर मे घुसने से पहले हनुमान चालीसा का एक-दो बार पाठ करना अनिवार्य रूप से शामिल हो गया है। इस दौरान मैं कब बहुसंख्यको से अल्पसंख्यको मे, और फिर उसके बाद अनुसूचित जन जातियो मे शामिल हो गया इसके बारे मे कोई ऐतिहासिक दस्तावेज विस्तृत जानकारी जुटा नही पाया। पत्नी जी अगर इसी रफ्तार से प्रयासरत रही तो वो दिन दूर नही जब मेरा नाम भी लुप्त-प्राय प्राणियो की श्रेणी मे दर्ज हो जायेगा।
पत्नी जी जिस सफाई से मेरी दिहाडी पर हाथ साफ करती हैं वो काबिले गौर है। हमारे वित्तमंत्री जी कर-उगाही के मामले मे मेरी पत्नी जी से काफी कुछ सीख सकते है। गोया पत्नी ना हो मानो कोई जादूगर हो। आपकी आंखो के सामने आपके हाथ पर रखा सौ रुपये का नोट दस-दस के आठ नोटो मे बदल जायेगा और आपको भनक तक नही लगेगी। हालांकि जिस तरह सबूतो के अभाव मे अक्सर देश के कुटिल अपराधी छूट जाते है, मैं गरीब भी अपनी पत्नी जी का हाथ इन हरकतो मे कभी साबित नहीं कर पाया। अगर कुछ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान लोग थोडी हिम्मत करके इस मामले मे सहयोग करें तो शायद इस रहस्य पर से पर्दा उठ सके।
लाख बचाने पर भी दिन मे एक दो बार पत्नी जी पर नजर पड ही जाती है। कभी-कभी नजर मिलने पर पत्नी जी मेरी तरफ अपनी दुर्लभ मुस्कुराहट फेंक देती है। सच कहूं तो उनकी हंसी को देखकर अकसर मैं सहम जाता हूं। परिपक्व नेताओ की तरह मेरी माननीय पत्नी जी भी कभी बेवजह नही हंसती है। अकसर उस मुसकुराहट की कीमत मुझको कभी अधपकी रोटी या प्रेस से जली हुई कमीज से चुकानी पडती है। मेरा छोटा सा ईंसानी दिमाग उस रह्स्यमय मुसकुराहट की वजह को खोजने के प्रयास मे कई बार बंद पड चुका है।
खैर, मन मे हनुमान चालीसा का जाप करते हुये, कांपते हाथो से मैने अपनी पत्नी जी को बिस्तर के अपने ईलाके से खिसकाना शुरू किया। वैसे आज हालात इतने बुरे नहीं थे। पत्नी जी ने शायद रहम करके, या फिर गलती से, तकिया और चादर पर अभी अपना कब्जा नही जमाया था।
© सर्वाधिकार सुरक्षित
टिप्पणियाँ
good going dude ! keep it up ;)
its really good..man..keep it up..u r damn good even in hidi literature.