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अभिनव का स्वर्ण, हमारे गले का फन्दा

आज जब दफ्तर से मैने घर का रुख किया तो उम्मीद न थी कि मुसीबतो का एक बड़ा ठीकरा मेरे सर पर फोड़ने के लिये हमारी पूज्यनीय पत्नीजी पूरी तरह से तैयार वैठी होगी। वैसे मेरा पति होने का अनुभव इतना कम है कि मेरे लिये अपनी पत्नीजी की तरफ से हुए किसी भी आक्रमण का अन्दाज लगाना मुश्किल ही नही, नामुमकिन है। सरकारी आँकड़ो की तरह मेरे अन्दाजें भी अक्सर जमीनी हक़ीकतो से कोसो दूर ही रहते थे। नतीजन, कई बार पत्नी जी के ऐसे हमलों के दौरान मै शहीद होते-होते बचा हूँ।
पर जो कभी नही हुआ, वो शायद आज होने जा रहा था। घर की घंटी बजाने से पहले ही पत्नी जी ने दरवाजा खोलकर मुसकुराते हुए अपने साक्षात दर्शन दिए। मेरे दिमाग मे खतरे की सारी घंटीयाँ एक साथ पूरे दम से बज उठी। न तो आज तनख्व्या मिलने का दिन था और न ही किसी की शादी का बुलौउआ आया था। वित्तमंत्री जी ने भी शादी-शुदा लोगों की लिये कर मे किसी प्रकार की कटौती की घोषणा नही की थी। फिर ऐसा क्या संकट आन पड़ा कि पत्नीजी को मुझे अपने साक्षात दर्शन देने की आवश्यकता महसूस हुई? यह ड़र मै अनुभव के आधार पर महसूस कर रहा था। मेरी पूज्यनीय पत्नीजी ने जब मुझे पहली बार हंस कर देखा था उसके दूसरे ही दिन अटल जी की सरकार गिर गई थी। आखिर बार उनके हँसने के तुरंत बाद पेट्रोल के दाम बढ़ गये थे। अब क्या आफत आने वाली थी?

अपनी प्रलय की घड़ी को निकट देख मेरे हाथ-पैर काँपने लगे, गला सूखने लगा, और रक्त-प्रवाह एकदम से धीमा पड गया। हनुमान चालीसा के रटे हुए छ्न्द कपूर की तरह हवा मे उड़ गये और आँखो के आगे अन्धेरा छाने लगा। तभी पत्नीजी ने मुझे सम्हाला और अपनी मुस्कुराहट को एकता कपूर के धारावाहिको की तरह खींचते हुई बोली, “पता है आज क्या हुआ?” मैने गले मे थूँक को गटक कर कहा, “नही, क्यों क्या हुआ?” आगे क्या होने वाला था इस की कल्पना से ही मेरा दिल डूबा जा रहा था। खतरे को भाँप मेरा चने के दाने जितना बराबर दिमाग कछुये की तेज चाल से चलने लगा था। कही ऐसा तो नही कि कामवाली बाई पत्नीजी की संसद मे फिर अपनी छुट्टियों की अरजी लगा गई हो और पत्नीजी हमेशा की तरह मुझे बिना दिहाडी की मजदूरी पर रखने की भूमिका तैयार कर रही हो?

पत्नीजी की मुस्कुराहट ने एकदम से सेंसेक्स की तरह गोता खाया। शायद मेरा अज्ञानता की चाशनी मे डूबा हुआ जबाब उनकी इच्छा के अनुरूप नही था। “ दुनिया मे क्या हो रहा है कुछ खबर है तुमको?”, पत्नीजी ने आँखे तरेर कर हाथों को नचाते हुए सवालो का दूसरा गोला दागा। बिना किसी चेतावनी के युद्द का शंखनाद हो चुका था। “ लोग देश के लिये क्या-क्या नही कर रहे और एक तुम हो कि तीस सालों से वहीं के वहीं पड़े हुए हो”, पत्नीजी ने एक लम्बे युद्द की तैयारी से कई गहरी साँसे अन्दर खींची, अपनी साड़ी के पल्लू को कमर मे घौंसा और अपने पूर्ण रौद्र स्वरूप का विस्तार किया।

“सरकारी करो के तले दबा हुआ, नेताओ की उठा-पटक के बीच, अपनी आत्मा की लाश को अपने शरीर मे पिछले तीस सालों से चुपचाप ढ़ो रहा हूँ—यह क्या कम उपलब्धि है?”, मैंने घिघियाते हुए जबाब दिया। यह मुआँ लेखक दिमाग भी...सिर पर तलवार लटक रही है और यह है कि शब्दो के ताजमहल बनाने पर तुला हुआ है।

मेरे जबाब से पत्नीजी और भड़क उठी, “बस तुम अपना रोना ऐसे ही रोते रहो और उधर वो पच्चीस साल का लड़का अभिनव बिन्द्रा ओलम्पिक मे देश के लिये स्वर्ण पदक मार कर ले गया। मेरी तो किस्मत ही फूटी है, थोड़ा इंतजार किया होता तो ‘अभि’ से ही रिश्ता पक्का होता; पल्ले पडी भी तो उसके जिसको खेल के नाम से ही चक्कर आते है।" पत्नीजी आज थोड़ी ज्यादा भावुक हो उठी थी। हम्म..तो सारे फसाद की जड़ यह लड़का अभिनव था।

“अरे, अगर तुमने पढ़ाई के अलावा थोड़ा ध्यान खेल-कूद मे दिया होता तो आज तुम्हारी गंदी बनियानो और मौजो की जगह घर मे कम से कम तीन-चार दर्जन सोने के तमगे तो लटक रहे होते। कुत्ते-बिल्लीयो से लेकर घर के हर नौकर-चाकर को अभी तक किसी न किसी धारावाहिको मे जगह मिल चुकी होती। हो सकता था कि किसी चौराहे पर तुम्हारी मूर्ति लग जाती या एक-दो सड़को के नाम तुम पर रख दिये गये होते”, पत्नीजी आज कोई कसर नही छोड़ना चाहती थी।

“कौन कहता है कि मुझे खेलना नही आता? चौथी कक्षा से लेकर दसवी कक्षा तक मौहल्ले मे ऐसा कोई नही था जो गुल्ली-ड़ंडा और कंचो के खेल मे मुझे चुनौती दे सके। विश्वास न हो तो अंतू और कन्नू से पूछ लेना”, मैने हिम्मत बटोर कर जबाब दिया। हालांकि हकीकत तो यह थी कि मुझे चुनौती तो कोई इसलिये नही दे पाता था क्योंकि मौहल्ले मे सिर्फ मेरे पास ही गुल्ली-ड़ंडा और कंचे थे। जो मेरी बात नही मानता था उसको खिलाना तो दूर, गुल्ली-ड़ंड़े और कंचो को हाथ भी नही लगाने देता था। पर इस वक़्त तो सोचना यह है कि अभिनव ने जिस ववाल को जन्म दिया है उससे कैसे निबटा जाये। पत्नी जी को चुप देख कर मैने अपने स्वर मे थोड़ी सी चाशनी और घोली, “मैने तुमसे कभी कुछ नही छुपाया। गुल्ली-ड़ंडा और कंचो के बारे मे भी मैने अपने शादी के बायो-डाटा मे साफ-साफ लिखा था, चाहे तो दोबारा पढ़ लो। अब अपने मुँह से क्या अपनी तारीफ करूँ, लंगड़ी, विष-अमृत और छुप्पन-छुपाई मे पूरे मोहल्ले मे मेरा कोई सानी नही था।” मेरी छाती अपने खेलो की उपलब्धियो के स्वर्णिम इतिहास को याद करके थोड़ी चोड़ी हो गयी। कही साँस न रुक जाये इस ड़र से मुझे अपनी शर्ट के उपर के बटन खोलने पड़ गये।

पर जिसका ड़र था, वही हो गया। पत्नीजी की नथुने मेट्रो-रेल की सुरंग की तरह फूल गये और उनके शरीर के काँपने से मानो पूरे घर मे भूचाल ही आ गया हो। रसोई मे करीने से लगे हुये बर्तन अपना अनुशासन भूल जमीन का रूख करने लगे। कपड़े सुखाने के लिये आँगन मे लगाई हुई रस्सी ने ‘तड़ाक’ की आवाज के साथ अपनी अंतिम साँसे पत्नीजी के चरणॉ मे समर्पित कर दी।

मुझे भान हो गया कि मैने मधुमख्खी के छ्त्ते मे हाथ ही नही बल्कि उसमे अपना पूरा शरीर ही ड़ाल दिया है। मैं उपर वाले से मन ही मन प्रार्थना करने लगा कि पत्नीजी के शब्दो के बाण जल्दी ही बाहर निकल आये क्योंकि मेरा यह तजुर्बा रहा है कि उनके शब्द बाहर नही आने का सीधा-साधा मतलब है कि उनके दिव्य अचूक अस्त्र “बेलन” के प्रकट होने का समय निकट है।

आफतो की मिसाईले बहुत जल्द मेरे ऊपर फटने वाली थी और समय बहुत कम था। खतरे को भांप मैने अपनी कॉपी और पेन को अपनी जेब मे घुसेड़ा और पलक झपकते ही घर से बाहर दौड़ लगा दी। ओलम्पिक का स्वर्ण जाये भाड़ मे, मेरे लिये तो दस-बारह रुपयो के मेरे कॉपी और पेन ही अनमोल है। रही बात अभिनव की, तो जरा यह घरेलू मामला ठंडा पड़े तो ओलम्पिक के उस “अंतरराष्टीय मामले” पर उन से खुल कर चर्चा करूँ।

टिप्पणियाँ

dinesh kandpal ने कहा…
ब्लाग परिवार में.. स्वागत है आपका
Unknown ने कहा…
ultimate i really impressed ..very good ..correct up to some extent.......keep writing

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