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इसलिए विदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के कुछ अख़बार

किस तरह हमारे कुछ अख़बार धीरे-धीरे हमसे हमारी बोलियाँ और भाषा छीन रहे हैं। प्रभु जोशी का एक विचारात्मक आलेख जो हम सभी को कुछ सोचने पर मजबूर करता है।

सृजनगाथा के सौजन्य से

टिप्पणियाँ

अनुनाद सिंह ने कहा…
प्रभु जोशी के लेख बहुत ही तर्कपूर्ण एवं प्रभावी होते हैं। लेख पढवाने के लिये साधुवाद!
admin ने कहा…
इस उपयोगी आलेख को लिंक उपलब्ध कराने का शुक्रिया।
वाह
आपकी प्रस्तुति सराहनीय
इसी तरह अच्छे लिंक लगाते रहें
Sumit Pratap Singh ने कहा…
सादर ब्लॉगस्ते,


दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आपने मेरे ब्लॉग पर पधारने का कष्ट किया व मेरी रचना 'एक पत्र आतंकियों के नाम' पर अपनी अमूल्य टिप्पणी दी। अब आपको फिर से निमंत्रित कर रहा हूँ। कृपया पधारें व 'एक पत्र राज ठाकरे के नाम' पर अपनी टिप्पणी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करें। आपकी प्रतीक्षा में पलकें बिछाए...

आपका ब्लॉगर मित्र

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