टीवी बन्द करके मैने अपने बगल मे लेटी हुई एकलौती पत्नी जी पर नजर डाली। बिस्तर की वास्तविक नियंत्रण रेखा का रोज की तरह उलंघन हो चुका था और मेरे पास सिवाए विरोध दर्ज कराने की पारम्पारिक परम्परा का निर्वाह करने के अलावा और कोई चारा नही था। विरोध दर्ज कराने से समस्या का हल तो नही निकलता पर इसी बहाने से कम से कम घर मे कुछ बोलने का मौका जरूर मिल जाता है। सुरसा की तरह मुँह फाडे, देश की सरकार की तरह कान मे तेल डाले, और शेयर बाजार की तरह् औंधी लेटी हुई अपनी पत्नी जी से अपने इलाके से हट जाने का नम्र निवेदन करने की भी मेरी हिम्मत नही हुई। कही पत्नी जी ब्लूलाईन बसो की तरह बेकाबू हो गई तो कौन करेगा मेरी रक्षा उस प्रलय की घडी मे। जनतंत्र मे मौलिक अधिकार अक्सर रद्दी के भाव बिकते है और वैसे भी मेरे सभी मौलिक अधिकार तो शादी के तुरंत बाद तत्काल प्रभाव से निष्क्रिय कर दिए गये थे। यकीन मानिए, मै आज भी अपने शादी के घिसे-पिटी विडियो को देख कर यह जानने की कोशिश करता हूं कि क्यों, कैसे और कब पंडितजी ने मेरे मौलिक अधिकारो को अग्निदेव को समर्पित किया था। उस दुख की घडी मे न तो मुझे पूरे देश को हिला देने मानव अधिक...
टिप्पणियाँ
आपकी प्रस्तुति सराहनीय
इसी तरह अच्छे लिंक लगाते रहें
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आपने मेरे ब्लॉग पर पधारने का कष्ट किया व मेरी रचना 'एक पत्र आतंकियों के नाम' पर अपनी अमूल्य टिप्पणी दी। अब आपको फिर से निमंत्रित कर रहा हूँ। कृपया पधारें व 'एक पत्र राज ठाकरे के नाम' पर अपनी टिप्पणी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करें। आपकी प्रतीक्षा में पलकें बिछाए...
आपका ब्लॉगर मित्र